जोश-ए-रहमत के वास्ते ज़ाहिद
है ज़रा सी गुनाह-गारी शर्त
दाग़ देहलवी
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कल तक तो आश्ना थे मगर आज ग़ैर हो
दो दिन में ये मिज़ाज है आगे की ख़ैर हो
दाग़ देहलवी
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ख़ार-ए-हसरत बयान से निकला
दिल का काँटा ज़बान से निकला
दाग़ देहलवी
की तर्क-ए-मय तो माइल-ए-पिंदार हो गया
मैं तौबा कर के और गुनहगार हो गया
दाग़ देहलवी
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कोई छींटा पड़े तो 'दाग़' कलकत्ते चले जाएँ
अज़ीमाबाद में हम मुंतज़िर सावन के बैठे हैं
दाग़ देहलवी
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कोई नाम-ओ-निशाँ पूछे तो ऐ क़ासिद बता देना
तख़ल्लुस 'दाग़' है वो आशिक़ों के दिल में रहते हैं
दाग़ देहलवी
क्या इज़्तिराब-ए-शौक़ ने मुझ को ख़जिल किया
वो पूछते हैं कहिए इरादे कहाँ के हैं
दाग़ देहलवी
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