ग़श खा के 'दाग़' यार के क़दमों पे गिर पड़ा
बेहोश ने भी काम किया होशियार का
दाग़ देहलवी
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ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया
दाग़ देहलवी
हम भी क्या ज़िंदगी गुज़ार गए
दिल की बाज़ी लगा के हार गए
दाग़ देहलवी
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हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं
वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं
दाग़ देहलवी
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हमें है शौक़ कि बे-पर्दा तुम को देखेंगे
तुम्हें है शर्म तो आँखों पे हाथ धर लेना
दाग़ देहलवी
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हसरतें ले गए इस बज़्म से चलने वाले
हाथ मलते ही उठे इत्र के मलने वाले
दाग़ देहलवी
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हज़ार बार जो माँगा करो तो क्या हासिल
दुआ वही है जो दिल से कभी निकलती है
दाग़ देहलवी
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