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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

इक अज़िय्यत है तो लज़्ज़त भी तिरे दर्द में है
बे-सुकूनी में भी आराम बहुत आता है

बुशरा फर्रुख




अर्सा हुआ किसी ने पुकारा नहीं मुझे
शायद किसी को मेरी ज़रूरत नहीं रही

बुशरा हाश्मी




दिल के ज़ख़्मों की चुभन दीदा-ए-तर से पूछो
मेरे अश्कों का है क्या मोल गुहर से पूछा

बुशरा हाश्मी




जो न कट सका वो निशान था किसी ज़ख़्म का
जो न मिल सका वो सराब था कोई ख़्वाब था

बुशरा हाश्मी




सरमाया-ए-हयात हुआ चाहता है ख़त्म
जिस पर ग़ुरूर था वही दौलत नहीं रही

बुशरा हाश्मी




वही लफ़्ज़ हैं दुर्र-ए-बे-बहा मिरे वास्ते
जिन्हें छू गई हो तिरी ज़बाँ मिरे मेहरबाँ

बुशरा हाश्मी




अदब ता'लीम का जौहर है ज़ेवर है जवानी का
वही शागिर्द हैं जो ख़िदमत-ए-उस्ताद करते हैं

चकबस्त ब्रिज नारायण