जवानों में तसादुम कैसे रुकता
क़बीले में कोई बूढ़ा नहीं था
अज़हर इनायती
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कभी क़रीब कभी दूर हो के रोते हैं
मोहब्बतों के भी मौसम अजीब होते हैं
अज़हर इनायती
करने को रौशनी के तआक़ुब का तजरबा
कुछ दूर मेरे साथ भी परछाइयाँ गईं
अज़हर इनायती
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ख़ुद-कुशी के लिए थोड़ा सा ये काफ़ी है मगर
ज़िंदा रहने को बहुत ज़हर पिया जाता है
अज़हर इनायती
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किसी के ऐब छुपाना सवाब है लेकिन
कभी कभी कोई पर्दा उठाना पड़ता है
अज़हर इनायती
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क्या रह गया है शहर में खंडरात के सिवा
क्या देखने को अब यहाँ आए हुए हैं लोग
अज़हर इनायती
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लोग यूँ कहते हैं अपने क़िस्से
जैसे वो शाह-जहाँ थे पहले
अज़हर इनायती
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