मैं जिसे ढूँडने निकला था उसे पा न सका
अब जिधर जी तिरा चाहे मुझे ख़ुश्बू ले जा
अज़हर इनायती
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मेरी ख़ामोशी पे थे जो तअना-ज़न
शोर में अपने ही बहरे हो गए
अज़हर इनायती
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मुझ को भी जागने की अज़िय्यत से दे नजात
ऐ रात अब तो घर के दर-ओ-बाम सो गए
अज़हर इनायती
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नक़्श मिटते हैं तो आता है ख़याल
रेत पर हम भी कहाँ थे पहले
अज़हर इनायती
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पलट चलें कि ग़लत आ गए हमीं शायद
रईस लोगों से मिलने के वक़्त होते हैं
अज़हर इनायती
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पुराने अहद में भी दुश्मनी थी
मगर माहौल ज़हरीला नहीं था
अज़हर इनायती
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सब देख कर गुज़र गए इक पल में और हम
दीवार पर बने हुए मंज़र में खो गए
अज़हर इनायती
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