बता रहा है झटकना तिरी कलाई का
ज़रा भी रंज नहीं है तुझे जुदाई का
अज़हर फ़राग़
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भँवर से ये जो मुझे बादबान खींचता है
ज़रूर कोई हवाओं के कान खींचता है
अज़हर फ़राग़
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दलील उस के दरीचे की पेश की मैं ने
किसी को पतली गली से नहीं निकलने दिया
अज़हर फ़राग़
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एक ही वक़्त में प्यासे भी हैं सैराब भी हैं
हम जो सहराओं की मिट्टी के घड़े होते हैं
अज़हर फ़राग़
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एक होने की क़स्में खाई जाएँ
और आख़िर में कुछ दिया लिया जाए
अज़हर फ़राग़
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गीले बालों को सँभाल और निकल जंगल से
इस से पहले कि तिरे पाँव ये झरना पड़ जाए
अज़हर फ़राग़
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गिरते पेड़ों की ज़द में हैं हम लोग
क्या ख़बर रास्ता खुले कब तक
अज़हर फ़राग़
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