मैं उस का नाम ले बैठा था इक दिन
ज़माने को बहाना चाहिए था
अज़हर अदीब
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मेरे हरे वजूद से पहचान उस की थी
बे-चेहरा हो गया है वो जब से झड़ा हूँ मैं
अज़हर अदीब
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निकल आया हूँ आगे उस जगह से
जहाँ से लौट जाना चाहिए था
अज़हर अदीब
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सारे मंज़र में समाया हुआ लगता है मुझे
कोई इस शहर में आया हुआ लगता है मुझे
अज़हर अदीब
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समझ में आ तो सकती है सबा की गुफ़्तुगू भी
मगर इस के लिए मा'सूम होना लाज़मी है
अज़हर अदीब
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शब भर आँख में भीगा था
पूरे दिन में सूखा ख़्वाब
अज़हर अदीब
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सुब्ह कैसी है वहाँ शाम की रंगत क्या है
अब तिरे शहर में हालात की सूरत क्या है
अज़हर अदीब
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