ठहरना भी मिरा जाना शुमार होने लगा
पड़े पड़े मैं पुराना शुमार होने लगा
अज़हर फ़राग़
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उस से हम पूछ थोड़ी सकते हैं
उस की मर्ज़ी जहाँ रखे जिस को
अज़हर फ़राग़
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उसे कहो जो बुलाता है गहरे पानी में
किनारे से बंधी कश्ती का मसअला समझे
अज़हर फ़राग़
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वैसे तो ईमान है मेरा उन बाँहों की गुंजाइश पर
देखना ये है उस कश्ती में कितना दरिया आ जाता है
अज़हर फ़राग़
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वस्ल के एक ही झोंके में
कान से बाले उतर गए
अज़हर फ़राग़
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वो दस्तियाब हमें इस लिए नहीं होता
हम इस्तिफ़ादा नहीं देख-भाल करते हैं
अज़हर फ़राग़
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ये ए'तिमाद भी मेरा दिया हुआ है तुम्हें
जो मेरे मशवरे बे-कार जाने लग गए हैं
अज़हर फ़राग़
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