देखने वाले मुझे मेरी नज़र से देख ले
मैं तिरी नज़रों में हूँ और मैं ही हर मंज़र में हूँ
आज़ाद गुलाटी
एक वो हैं कि जिन्हें अपनी ख़ुशी ले डूबी
एक हम हैं कि जिन्हें ग़म ने उभरने न दिया
आज़ाद गुलाटी
हर इक ने देखा मुझे अपनी अपनी नज़रों से
कोई तो मेरी नज़र से भी देखता मुझ को
आज़ाद गुलाटी
किस से पूछें रात-भर अपने भटकने का सबब
सब यहाँ मिलते हैं जैसे नींद में जागे हुए
आज़ाद गुलाटी
किसे मिलती नजात 'आज़ाद' हस्ती के मसाइल से
कि हर कोई मुक़य्यद आब ओ गिल के सिलसिलों का था
आज़ाद गुलाटी
कुछ ऐसे फूल भी गुज़रे हैं मेरी नज़रों से
जो खिल के भी न समझ पाए ज़िंदगी क्या है
आज़ाद गुलाटी
मैं साथ ले के चलूँगा तुम्हें ऐ हम-सफ़रो
मैं तुम से आगे हूँ लेकिन ठहरने वाला हूँ
आज़ाद गुलाटी

