सज़ाएँ तो हर हाल में लाज़मी थीं
ख़ताएँ न कर के पशेमानीयाँ हैं
आज़ाद अंसारी
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तलब-ए-आशिक़-ए-सादिक़ में असर होता है
गो ज़रा देर में होता है मगर होता है
आज़ाद अंसारी
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आज आईने में ख़ुद को देख कर याद आ गया
एक मुद्दत हो गई जिस शख़्स को देखे हुए
आज़ाद गुलाटी
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आप जिस रह-गुज़र-ए-दिल से कभी गुज़रे थे
उस पे ता-उम्र किसी को भी गुज़रने न दिया
आज़ाद गुलाटी
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आसमाँ एक सुलगता हुआ सहरा है जहाँ
ढूँढता फिरता है ख़ुद अपना ही साया सूरज
आज़ाद गुलाटी
अपनी सारी काविशों को राएगाँ मैं ने किया
मेरे अंदर जो न था उस को बयाँ मैं ने किया
आज़ाद गुलाटी
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दश्त-ए-ज़ुल्मात में हम-राह मिरे
कोई तो है जो जला है मुझ में
आज़ाद गुलाटी
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