तुम्हारे साथ मिरे मुख़्तलिफ़ मरासिम हैं
मिरी वफ़ा पे कभी इन्हिसार मत करना
आसिम वास्ती
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तू मिरे पास जब नहीं होता
तुझ से करता हूँ किस क़दर बातें
आसिम वास्ती
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वक़्त बे-वक़्त झलकता है मिरी सूरत से
कौन चेहरा मिरी तश्कील में आया हुआ है
आसिम वास्ती
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ये हम-सफ़र तो सभी अजनबी से लगते हैं
मैं जिस के साथ चला था वो क़ाफ़िला है कहाँ
आसिम वास्ती
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ज़ाविया धूप ने कुछ ऐसा बनाया है कि हम
साए को जिस्म की जुम्बिश से जुदा देखते हैं
आसिम वास्ती
आइने पर तो है भरोसा मुझे
उस से क्यूँ मुँह छुपाए बैठी हूँ
आसिमा ताहिर
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बाम-ओ-दर पर उतरने वाली धूप
सब्ज़ रंग-ए-मलाल रखती है
आसिमा ताहिर
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