इंतिहाई हसीन लगती है
जब वो करती है रूठ कर बातें
आसिम वास्ती
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कहीं कहीं तो ज़मीं आसमाँ से ऊँची है
ये राज़ मुझ पे खुला सीढ़ियाँ उतरते हुए
आसिम वास्ती
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ख़ुश्क रुत में इस जगह हम ने बनाया था मकान
ये नहीं मालूम था ये रास्ता पानी का है
आसिम वास्ती
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किसी भी काम में लगता नहीं है दिल मेरा
बड़े दिनों से तबीअत बुझी बुझी सी है
आसिम वास्ती
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कुछ वो भी तबीअत का सुखी ऐसा नहीं है
कुछ हम भी मोहब्बत में क़नाअत नहीं करते
आसिम वास्ती
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लोग कहते हैं कि वो शख़्स है ख़ुशबू जैसा
साथ शायद उसे ले आए हवा देखते हैं
आसिम वास्ती
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मैं इंहिमाक में ये किस मक़ाम तक पहुँचा
तुझे ही भूल गया तुझ को याद करते हुए
आसिम वास्ती
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