मुझ से जो पूछते हो तो हर हाल शुक्र है
यूँ भी गुज़र गई मिरी वूँ भी गुज़र गई
अशरफ़ अली फ़ुग़ाँ
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अब तो चलना है किसी और ही रफ़्तार के साथ
जिस्म बिस्तर पे गिराऊँगा चला जाऊँगा
अशरफ़ जावेद
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बसीत-ए-दश्त की हुर्मत को बाम-ओ-दर दे दे
मिरे ख़ुदाया मुझे भी तो एक घर दे दे
अशरफ़ जावेद
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फ़लक से रोज़ उतरते हैं रौशनी के ख़ुतूत
मगर न चमके मुक़द्दर ग़रीब-ख़ानों के
अशरफ़ जावेद
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उतनी ही निगाहों की मिरी प्यास बढ़ी है
जितनी कि तुझे देख के तस्कीन हुई है
अशरफ़ रफ़ी
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तिरे बदन के नए ज़ाविए बनाता हुआ
गुज़र रहा है कोई दाएरे बनाता हुआ
अशरफ़ सलीम
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एक तस्वीर हूँ ग़म की जिस पर
मुस्कुराने का गुमाँ होता है
अशरफ़ यूसुफ़
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