तेरा मेरा है गुमाँ का रिश्ता
तू है मेरी तिरी ईजाद हूँ मैं
आसिफ़ रज़ा
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ये दिल में वसवसा क्या पल रहा है
तिरा मिलना भी मुझ को खल रहा है
आसिफ़ रज़ा
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ये मिरी बज़्म नहीं है लेकिन
दिल लगा है तो लगा रहने दो
आसिफ़ रज़ा
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दिल की मौजों की तड़प मेरी सदा में आए
दाएरे कर्ब के फैले तो हवा में आए
अासिफ़ साक़िब
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किस दर्जा मुनाफ़िक़ हैं सब अहल-ए-हवस 'साक़िब'
अंदर से तो पत्थर हैं और लगते हैं पानी से
अासिफ़ साक़िब
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लकीर खींच के मुझ पे वो फिर मुझे देखे
निगार-ओ-नक़्श में चेहरा है हू-ब-हू मेरा
अासिफ़ साक़िब
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क़ैदी रिहा हुए थे पहन कर नए लिबास
हम तो क़फ़स से ओढ़ के ज़ंजीर चल पड़े
अासिफ़ साक़िब
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