रस्ते की अंजान ख़ुशी है
मंज़िल का अन-जाना डर है
अासिफ़ साक़िब
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समेट ले गए सब रहमतें कहाँ मेहमान
मकान काटता फिरता है मेज़बानों को
अासिफ़ साक़िब
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सीने के बीच 'साक़िब' ऐसा है मरना जीना
इक याद जी उठी थी इक याद मर गई है
अासिफ़ साक़िब
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बाज़ चेहरे बहुत हसीन सही
फिर भी कितनों से दोस्ती की जाए
अासिफ़ा निशात
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वो मेरे ख़्वाब ले के सिरहाने खड़ा रहा
मैं सो रही थी उस ने जगाया नहीं मुझे
अासिफ़ा निशात
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फ़ाएदा क्या है नसीहत से फिरे हो नासेह
हम समझने के नहीं लाख तू समझाए हमें
आसिफ़ुद्दौला
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हम इश्क़ के बंदे हैं मज़हब से नहीं वाक़िफ़
गर का'बा हुआ तो क्या बुत-ख़ाना हुआ तो क्या
आसिफ़ुद्दौला
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