हवा के लम्स में उस की महक भी होती है
वो शाख़-ए-गुल जो कहीं रू-ब-रू नहीं होती
अशरफ़ यूसुफ़
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आँसुओं को फ़ुज़ूल मत समझो
ये बड़े क़ीमती सहारे हैं
आसिफ़ रज़ा
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अजनबी मुझ से आ गले मिल ले
आज इक दोस्त याद आए मुझे
आसिफ़ रज़ा
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भूल बैठा हूँ मैं ज़माने को
अब ज़माना भी भूल जाए मुझे
आसिफ़ रज़ा
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जतन तो ख़ूब किए उस ने टालने के मगर
मैं उस की बज़्म से उस के जवाब तक न उठा
आसिफ़ रज़ा
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सिर्फ़ मैं अपनी कहानी ही नहीं
सुन मुझे तेरी भी रूदाद हूँ मैं
आसिफ़ रज़ा
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ता-कि न निगाहों को अंधेरे नज़र आएँ
आईना उजालों ने ये चमकाया हुआ है
आसिफ़ रज़ा
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