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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

हवा दरख़्तों से कहती है दुख के लहजे में
अभी मुझे कई सहराओं से गुज़रना है

असअ'द बदायुनी




हवा के अपने इलाक़े हवस के अपने मक़ाम
ये कब किसी को ज़फ़र-याब देख सकते हैं

असअ'द बदायुनी




जब तलक आज़ाद थे हर इक मसाफ़त थी वबाल
जब पड़ी ज़ंजीर पैरों में सफ़र अच्छे लगे

असअ'द बदायुनी




जम गई धूल मुलाक़ात के आईनों पर
मुझ को उस की न उसे मेरी ज़रूरत कोई

असअ'द बदायुनी




जिसे न मेरी उदासी का कुछ ख़याल आया
मैं उस के हुस्न पे इक रोज़ ख़ाक डाल आया

असअ'द बदायुनी




जिसे पढ़ते तो याद आता था तेरा फूल सा चेहरा
हमारी सब किताबों में इक ऐसा बाब रहता था

असअ'द बदायुनी




कभी मौज-ए-ख़्वाब में खो गया कभी थक के रेत पे सो गया
यूँही उम्र सारी गुज़ार दी फ़क़त आरज़ू-ए-विसाल में

असअ'द बदायुनी