ख़ाक हूँ लेकिन सरापा नूर है मेरा वजूद
इस ज़मीं पर चाँद सूरज का नुमाइंदा हूँ मैं
अनवर सदीद
खुली ज़बान तो ज़र्फ़ उन का हो गया ज़ाहिर
हज़ार भेद छुपा रक्खे थे ख़मोशी में
अनवर सदीद
कोई भी पेचीदगी हाएल नहीं अनवर-'सदीद'
ज़िंदगी है सामने मंज़र-ब-मंज़र और मैं
अनवर सदीद
पँख हिला कर शाम गई है इस आँगन से
अब उतरेगी रात अनोखी यादों वाली
अनवर सदीद
सैल-ए-ज़माँ में डूब गए मशहूर-ए-ज़माना लोग
वक़्त के मुंसिफ़ ने कब रक्खा क़ाएम उन का नाम
अनवर सदीद
शिकवा किया ज़माने का तो उस ने ये कहा
जिस हाल में हो ज़िंदा रहो और ख़ुश रहो
अनवर सदीद
तू जिस्म है तो मुझ से लिपट कर कलाम कर
ख़ुशबू है गर तो दिल में सिमट कर कलाम कर
अनवर सदीद

