मैं अब तो शहर में इस बात से पहचाना जाता हूँ
तुम्हारा ज़िक्र करना और करते ही चले जाना
अंजुम ख़लीक़
मिरे जुनूँ को हवस में शुमार कर लेगा
वो मेरे तीर से मुझ को शिकार कर लेगा
अंजुम ख़लीक़
मिरी हवस के मुक़ाबिल ये शहर छोटे हैं
ख़ला में जा के नई बस्तियाँ तलाश करूँ
अंजुम ख़लीक़
मिरी ख़ातिर से ये इक ज़ख़्म जो मिट्टी ने खाया है
ज़रा कुछ और ठहरो इस के भरते ही चले जाना
अंजुम ख़लीक़
मिरी ता'मीर बेहतर शक्ल में होने को है 'अंजुम'
कि जंगल साफ़ होने से नगर आबाद होते हैं
अंजुम ख़लीक़
नख़्ल-ए-अना में ज़ोर-ए-नुमू किस ग़ज़ब का था
ये पेड़ तो ख़िज़ाँ में भी शादाब रह गया
अंजुम ख़लीक़
सरों से ताज बड़े जिस्म से अबाएँ बड़ी
ज़माने हम ने तिरा इंतिख़ाब देख लिया
अंजुम ख़लीक़

