ये कौन निकल आया यहाँ सैर-ए-चमन को
शाख़ों से महकते हुए ज़ेवर निकल आए
अंजुम ख़लीक़
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ज़बाँ-बंदी के मौसम में गली-कूचों की मत पूछो
परिंदों के चहकने से शजर आबाद होते हैं
अंजुम ख़लीक़
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ज़मीं की गोद में इतना सुकून था 'अंजुम'
कि जो गया वो सफ़र की थकान भूल गया
अंजुम ख़लीक़
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ज़रा सी मैं ने तरजीहात की तरतीब बदली थी
कि आपस में उलझ कर रह गए दुनिया ओ दीं मेरे
अंजुम ख़लीक़
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ज़रफ़िशाँ है मिरी ज़रख़ेज़ ज़मीनों का बदन
ज़र्रा ज़र्रा मिरे पंजाब का पारस निकला
अंजुम ख़लीक़
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अँधेरी रात है साया तो हो नहीं सकता
ये कौन है जो मिरे साथ साथ चलता है
अंजुम ख़याली
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आँख झपकीं तो इतने अर्से में
जाने कितने बरस गुज़र जाएँ
अंजुम ख़याली
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