जाने किस बात से दुखा है बहुत
दिल कई रोज़ से ख़फ़ा है बहुत
आलोक मिश्रा
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जब से देखा है ख़्वाब में उस को
दिल मुसलसल किसी सफ़र में है
आलोक मिश्रा
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क्या क़यामत है कि तेरी ही तरह से मुझ से
ज़िंदगी ने भी बहुत दूर का रिश्ता रक्खा
आलोक मिश्रा
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मैं भी बिखरा हुआ हूँ अपनों में
वो भी तन्हा सा अपने घर में है
आलोक मिश्रा
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सब सितारे दिलासा देते हैं
चाँद रातों को चीख़ता है बहुत
आलोक मिश्रा
धावा बोलेगा बहुत जल्द ख़िज़ाँ का लश्कर
शाख़ को नेज़ा करूँ फूल को तलवार करूँ
आलोक यादव
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दिलकशी थी उन्सियत थी या मोहब्बत या जुनून
सब मराहिल तुझ से जो मंसूब थे अच्छे लगे
आलोक यादव
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