तमाम जिस्म की उर्यानियाँ थीं आँखों में
वो मेरी रूह में उतरा हिजाब पहने हुए
साक़ी फ़ारुक़ी
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तेरे चेहरे पे उजाले की सख़ावत ऐसी
और मिरी रूह में नादार अंधेरा ऐसा
साक़ी फ़ारुक़ी
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तुझ से मिलने का रास्ता बस एक
और बिछड़ने के रास्ते हैं बहुत
साक़ी फ़ारुक़ी
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तुम और किसी के हो तो हम और किसी के
और दोनों ही क़िस्मत की शिकायत नहीं करते
साक़ी फ़ारुक़ी
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तुम और किसी के हो तो हम और किसी के
और दोनों ही क़िस्मत की शिकायत नहीं करते
साक़ी फ़ारुक़ी
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तू जान-ए-मोहब्बत है मगर तेरी तरफ़ भी
इक ख़्वाहिश-ए-तश्हीर-ए-वफ़ा ले गई हम को
साक़ी फ़ारुक़ी
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उस के वारिस नज़र नहीं आए
शायद उस लाश के पते हैं बहुत
साक़ी फ़ारुक़ी
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