ये कैसी बात हुई है कि देख कर ख़ुश है
वो आँसुओं के समुंदर के दरमियान मुझे
साक़ी फ़ारुक़ी
ये क्या तिलिस्म है क्यूँ रात भर सिसकता हूँ
वो कौन है जो दियों में जला रहा है मुझे
साक़ी फ़ारुक़ी
आधी से ज़ियादा शब-ए-ग़म काट चुका हूँ
अब भी अगर आ जाओ तो ये रात बड़ी है
साक़िब लखनवी
आप उठ रहे हैं क्यूँ मिरे आज़ार देख कर
दिल डूबते हैं हालत-ए-बीमार देख कर
साक़िब लखनवी
आप उठ रहे हैं क्यूँ मिरे आज़ार देख कर
दिल डूबते हैं हालत-ए-बीमार देख कर
साक़िब लखनवी
अपने दिल-ए-बेताब से मैं ख़ुद हूँ परेशाँ
क्या दूँ तुम्हें इल्ज़ाम मैं कुछ सोच रहा हूँ
साक़िब लखनवी
बाग़बाँ ने आग दी जब आशियाने को मिरे
जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे
साक़िब लखनवी

