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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

मैं अपने शहर से मायूस हो के लौट आया
पुराने सोग बसे थे नए मकानों में

साक़ी फ़ारुक़ी




मैं अपने शहर से मायूस हो के लौट आया
पुराने सोग बसे थे नए मकानों में

साक़ी फ़ारुक़ी




मैं अपनी आँखों से अपना ज़वाल देखता हूँ
मैं बेवफ़ा हूँ मगर बे-ख़बर न जान मुझे

साक़ी फ़ारुक़ी




मैं खिल नहीं सका कि मुझे नम नहीं मिला
साक़ी मिरे मिज़ाज का मौसम नहीं मिला

साक़ी फ़ारुक़ी




मैं ने चाहा था कि अश्कों का तमाशा देखूँ
और आँखों का ख़ज़ाना था कि ख़ाली निकला

साक़ी फ़ारुक़ी




मैं तो ख़ुदा के साथ वफ़ादार भी रहा
ये ज़ात का तिलिस्म मगर टूटता नहीं

साक़ी फ़ारुक़ी




मैं उन से भी मिला करता हूँ जिन से दिल नहीं मिलता
मगर ख़ुद से बिछड़ जाने का अंदेशा भी रहता है

साक़ी फ़ारुक़ी