ख़ाक मैं उस की जुदाई में परेशान फिरूँ
जब कि ये मिलना बिछड़ना मिरी मर्ज़ी निकला
साक़ी फ़ारुक़ी
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ख़ामुशी छेड़ रही है कोई नौहा अपना
टूटता जाता है आवाज़ से रिश्ता अपना
साक़ी फ़ारुक़ी
ख़ामुशी छेड़ रही है कोई नौहा अपना
टूटता जाता है आवाज़ से रिश्ता अपना
साक़ी फ़ारुक़ी
ख़ुदा के वास्ते मौक़ा न दे शिकायत का
कि दोस्ती की तरह दुश्मनी निभाया कर
साक़ी फ़ारुक़ी
लोग लम्हों में ज़िंदा रहते हैं
वक़्त अकेला इसी सबब से है
साक़ी फ़ारुक़ी
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लोग लम्हों में ज़िंदा रहते हैं
वक़्त अकेला इसी सबब से है
साक़ी फ़ारुक़ी
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मगर उन सीपियों में पानियों का शोर कैसा था
समुंदर सुनते सुनते कान बहरे कर लिए हम ने
साक़ी फ़ारुक़ी
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