ये लोग इश्क़ में सच्चे नहीं हैं वर्ना हिज्र
न इब्तिदा न कहीं इंतिहा में आता है
सलीम कौसर
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ये लोग इश्क़ में सच्चे नहीं हैं वर्ना हिज्र
न इब्तिदा न कहीं इंतिहा में आता है
सलीम कौसर
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ज़ोरों पे 'सलीम' अब के है नफ़रत का बहाव
जो बच के निकल आएगा तैराक वही है
सलीम कौसर
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हर बज़्म क्यूँ नुमाइश-ए-ज़ख़्म-ए-हुनर बने
हर भेद अपने दोस्तों के दरमियाँ न खोल
सलीम शाहिद
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हर लहज़ा उस के पाँव की आहट पे कान रख
दरवाज़े तक जो आया है अंदर भी आएगा
सलीम शाहिद
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आग भी बरसी दरख़्तों पर वहीं
काल बस्ती में जहाँ पानी का था
सलीम शहज़ाद
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अन-कही कह अन-सुनी बातें सुना
रह गया जो कुछ भी सोचा सोच ले
सलीम शहज़ाद
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