क़दमों में साए की तरह रौंदे गए हैं हम
हम से ज़ियादा तेरा तलबगार कौन है
सलीम कौसर
क़दमों में साए की तरह रौंदे गए हैं हम
हम से ज़ियादा तेरा तलबगार कौन है
सलीम कौसर
क़ुर्बतें होते हुए भी फ़ासलों में क़ैद हैं
कितनी आज़ादी से हम अपनी हदों में क़ैद हैं
सलीम कौसर
रात को रात ही इस बार कहा है हम ने
हम ने इस बार भी तौहीन-ए-अदालत नहीं की
सलीम कौसर
रात को रात ही इस बार कहा है हम ने
हम ने इस बार भी तौहीन-ए-अदालत नहीं की
सलीम कौसर
साए गली में जागते रहते हैं रात भर
तन्हाइयों की ओट से झाँका न कर मुझे
सलीम कौसर
साँस लेने से भी भरता नहीं सीने का ख़ला
जाने क्या शय है जो बे-दख़्ल हुई है मुझ में
सलीम कौसर

