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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

कअ'बे में सख़्त-कलामी सुन ली
बुत-कदे में न कभी आइएगा

सख़ी लख़नवी




कभी पहुँचेगा दिल उन उँगलियों तक
नगीने की तरह ख़ातिम में जड़ के

सख़ी लख़नवी




कभी पहुँचेगा दिल उन उँगलियों तक
नगीने की तरह ख़ातिम में जड़ के

सख़ी लख़नवी




कहना मजनूँ से कि कल तेरी तरफ़ आऊँगा
ढूँडने जाता हूँ फ़रहाद को कोहसार में आज

सख़ी लख़नवी




ख़ाल और रुख़ से किस को दूँ निस्बत
ऐसे तारे न ऐसा प्यारा चाँद

सख़ी लख़नवी




ख़ाल और रुख़ से किस को दूँ निस्बत
ऐसे तारे न ऐसा प्यारा चाँद

सख़ी लख़नवी




ख़ुदा के पास क्या जाएँगे ज़ाहिद
गुनाह-गारों से जब ये बार पाएँ

सख़ी लख़नवी