कअ'बे में सख़्त-कलामी सुन ली
बुत-कदे में न कभी आइएगा
सख़ी लख़नवी
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कभी पहुँचेगा दिल उन उँगलियों तक
नगीने की तरह ख़ातिम में जड़ के
सख़ी लख़नवी
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कभी पहुँचेगा दिल उन उँगलियों तक
नगीने की तरह ख़ातिम में जड़ के
सख़ी लख़नवी
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कहना मजनूँ से कि कल तेरी तरफ़ आऊँगा
ढूँडने जाता हूँ फ़रहाद को कोहसार में आज
सख़ी लख़नवी
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ख़ाल और रुख़ से किस को दूँ निस्बत
ऐसे तारे न ऐसा प्यारा चाँद
सख़ी लख़नवी
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ख़ाल और रुख़ से किस को दूँ निस्बत
ऐसे तारे न ऐसा प्यारा चाँद
सख़ी लख़नवी
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ख़ुदा के पास क्या जाएँगे ज़ाहिद
गुनाह-गारों से जब ये बार पाएँ
सख़ी लख़नवी
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