चर्ख़ पर बद्र जिस को कहते हैं
यार का साग़र-ए-सिफ़ाली है
सख़ी लख़नवी
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दफ़्न हम हो चुके तो कहते हैं
इस गुनहगार का ख़ुदा-हाफ़िज़
सख़ी लख़नवी
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दर्द को गुर्दा तड़पने को जिगर
हिज्र में सब हैं मगर दिल तो नहीं
सख़ी लख़नवी
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दर्द को गुर्दा तड़पने को जिगर
हिज्र में सब हैं मगर दिल तो नहीं
सख़ी लख़नवी
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देखें कहता है ख़ुदा हश्र के दिन
तुम को क्या ग़ैर को क्या हम को क्या
सख़ी लख़नवी
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देखो क़लई खुलेगी साफ़ उस की
आईना उन के मुँह चढ़ा है आज
सख़ी लख़नवी
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देखो क़लई खुलेगी साफ़ उस की
आईना उन के मुँह चढ़ा है आज
सख़ी लख़नवी
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