की ख़िताबत को गर ख़ुदा समझा
बंदा भी आख़िर आदमी ही तो है
सख़ी लख़नवी
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की ख़िताबत को गर ख़ुदा समझा
बंदा भी आख़िर आदमी ही तो है
सख़ी लख़नवी
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क्या आतिश-ए-फ़ुर्क़त ने बुरी पाई है तासीर
इस आग से पानी भी बुझाया नहीं जाता
सख़ी लख़नवी
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क्यूँ हसीनों की आँखों से न लड़े
मेरी पुतली की मर्दुमी ही तो है
सख़ी लख़नवी
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क्यूँ हसीनों की आँखों से न लड़े
मेरी पुतली की मर्दुमी ही तो है
सख़ी लख़नवी
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ली ज़बाँ उस की जो मुँह में हो गया ज़ौक़-ए-नबात
उँगलियाँ चूसीं तो ज़ौक़-ए-नैशकर पैदा हुआ
सख़ी लख़नवी
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मैं तुझे फिर ज़मीं दिखाऊँगा
देख मुझ से न आसमान बिगड़
सख़ी लख़नवी
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