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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

कभी जिगर पे कभी दिल पे चोट पड़ती है
तिरी नज़र के निशाने बदलते रहते हैं

सैफ़ुद्दीन सैफ़




कैसे जीते हैं ये किस तरह जिए जाते हैं
अहल-ए-दिल की बसर-औक़ात पे रोना आया

सैफ़ुद्दीन सैफ़




कितने अंजान हैं क्या सादगी से पूछते हैं
कहिए क्या मेरी किसी बात पे रोना आया

सैफ़ुद्दीन सैफ़




कितने अंजान हैं क्या सादगी से पूछते हैं
कहिए क्या मेरी किसी बात पे रोना आया

सैफ़ुद्दीन सैफ़




कोई ऐसा अहल-ए-दिल हो कि फ़साना-ए-मोहब्बत
मैं उसे सुना के रोऊँ वो मुझे सुना के रोए

सैफ़ुद्दीन सैफ़




क्या क़यामत है हिज्र के दिन भी
ज़िंदगी में शुमार होते हैं

सैफ़ुद्दीन सैफ़




क्या क़यामत है हिज्र के दिन भी
ज़िंदगी में शुमार होते हैं

सैफ़ुद्दीन सैफ़