कभी जिगर पे कभी दिल पे चोट पड़ती है
तिरी नज़र के निशाने बदलते रहते हैं
सैफ़ुद्दीन सैफ़
कैसे जीते हैं ये किस तरह जिए जाते हैं
अहल-ए-दिल की बसर-औक़ात पे रोना आया
सैफ़ुद्दीन सैफ़
कितने अंजान हैं क्या सादगी से पूछते हैं
कहिए क्या मेरी किसी बात पे रोना आया
सैफ़ुद्दीन सैफ़
कितने अंजान हैं क्या सादगी से पूछते हैं
कहिए क्या मेरी किसी बात पे रोना आया
सैफ़ुद्दीन सैफ़
कोई ऐसा अहल-ए-दिल हो कि फ़साना-ए-मोहब्बत
मैं उसे सुना के रोऊँ वो मुझे सुना के रोए
सैफ़ुद्दीन सैफ़
क्या क़यामत है हिज्र के दिन भी
ज़िंदगी में शुमार होते हैं
सैफ़ुद्दीन सैफ़
क्या क़यामत है हिज्र के दिन भी
ज़िंदगी में शुमार होते हैं
सैफ़ुद्दीन सैफ़

