आप ठहरे हैं तो ठहरा है निज़ाम-ए-आलम
आप गुज़रे हैं तो इक मौज-ए-रवाँ गुज़री है
सैफ़ुद्दीन सैफ़
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ऐसे लम्हे भी गुज़ारे हैं तिरी फ़ुर्क़त में
जब तिरी याद भी इस दिल पे गिराँ गुज़री है
सैफ़ुद्दीन सैफ़
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अपनी वुसअत में खो चुका हूँ मैं
राह दिखला सको तो आ जाओ
सैफ़ुद्दीन सैफ़
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अपनी वुसअत में खो चुका हूँ मैं
राह दिखला सको तो आ जाओ
सैफ़ुद्दीन सैफ़
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बोले वो कुछ ऐसी बे-रुख़ी से
दिल ही में रहा सवाल अपना
सैफ़ुद्दीन सैफ़
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चलो मय-कदे में बसेरा ही कर लो
न आना पड़ेगा न जाना पड़ेगा
सैफ़ुद्दीन सैफ़
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चलो मय-कदे में बसेरा ही कर लो
न आना पड़ेगा न जाना पड़ेगा
सैफ़ुद्दीन सैफ़
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