EN اردو
2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

ख़ुलूस-ए-शौक़ में 'साहिर' बड़ी तासीर होती है
वहीं का'बा सिमट आया जबीं हम ने जहाँ रख दी

साहिर सियालकोटी




सँभल कर पाँव रखना वादी-ए-इश्क़-ओ-मोहब्बत में
यहाँ जो सैर को आता है बच कर कम निकलता है

साहिर सियालकोटी




सँभल कर पाँव रखना वादी-ए-इश्क़-ओ-मोहब्बत में
यहाँ जो सैर को आता है बच कर कम निकलता है

साहिर सियालकोटी




ये क्यूँकर मान लें उल्फ़त हमें करनी नहीं आती
किया है काम ही क्या और उल्फ़त के सिवा हम ने

साहिर सियालकोटी




नहीं हैं बोलने वाले जो चार सू अपने
हमारे कानों में ये शोर क्यूँ भरा हुआ है

सईद इक़बाल सादी




यही आदत तो है 'सादी' सुकून-ए-क़ल्ब का बाइस
मैं नफ़रत भूल जाता हूँ मोहब्बत बाँट देता हूँ

सईद इक़बाल सादी




चिंगारियाँ न डाल मिरे दिल के घाव में
मैं ख़ुद ही जल रहा हूँ ग़मों के अलाव में

सैफ़ ज़ुल्फ़ी