शेर गुफा से निकलेगा
शोर मचेगा जंगल में
साहिल अहमद
उन से ऐ दोस्त मिरा यूँ कोई रिश्ता तो न था
क्यूँ फिर इस तर्क-ए-तअल्लुक़ से पशेमान था मैं
साहिल अहमद
बाँध के सफ़ हों सब खड़े तेग़ के साथ सर झुके
आज तो क़त्ल-गाह में धूम से हो नमाज़-ए-इश्क़
साहिर भोपाली
बाँध के सफ़ हों सब खड़े तेग़ के साथ सर झुके
आज तो क़त्ल-गाह में धूम से हो नमाज़-ए-इश्क़
साहिर भोपाली
वफ़ा तो कैसी जफ़ा भी नहीं है अब हम पर
अब इतना सख़्त मोहब्बत से इंतिक़ाम न ले
साहिर भोपाली
वफ़ा तो कैसी जफ़ा भी नहीं है अब हम पर
अब इतना सख़्त मोहब्बत से इंतिक़ाम न ले
साहिर भोपाली
आते हुए इस तन में न जाते हुए तन से
है जान-ए-मकीं को न लगावट न रुकावट
साहिर देहल्वी

