बे-निशाँ साहिर निशाँ में आ के शायद बन गया
ला-मकाँ हो कर मकाँ में ख़ुद मकीं होता रहा
साहिर देहल्वी
ग़म-ए-मौजूद ग़लत और ग़म-ए-फ़र्दा बातिल
राहत इक ख़्वाब है जिस की कोई ताबीर नहीं
साहिर देहल्वी
है सनम-ख़ाना मिरा पैमान-ए-इश्क़
ज़ौक़-ए-मय-ख़ाना मुझे सामान-ए-इश्क़
साहिर देहल्वी
है सनम-ख़ाना मिरा पैमान-ए-इश्क़
ज़ौक़-ए-मय-ख़ाना मुझे सामान-ए-इश्क़
साहिर देहल्वी
हम गदा-ए-दर-ए-मय-ख़ाना हैं ऐ पीर-ए-मुग़ाँ
काम अपना तिरे सदक़े में चला लेते हैं
साहिर देहल्वी
जो ला-मज़हब हो उस को मिल्लत-ओ-मशरब से क्या मतलब
मिरा मशरब है रिंदी रिंद को मज़हब से क्या मतलब
साहिर देहल्वी
जो ला-मज़हब हो उस को मिल्लत-ओ-मशरब से क्या मतलब
मिरा मशरब है रिंदी रिंद को मज़हब से क्या मतलब
साहिर देहल्वी

