मौज मौज तूफ़ाँ है मौज मौज साहिल है
कितने डूब जाते हैं कितने बच निकलते हैं
सहबा लखनवी
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बंद आँखें करूँ और ख़्वाब तुम्हारे देखूँ
तपती गर्मी में भी वादी के नज़ारे देखूँ
साहिबा शहरयार
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आज कुआँ भी चीख़ उठा है
किसी ने पत्थर मारा होगा
साहिल अहमद
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अब के वो ऐसे सफ़र पर क्या गए
फिर दोबारा लौट कर आए नहीं
साहिल अहमद
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अब के वो ऐसे सफ़र पर क्या गए
फिर दोबारा लौट कर आए नहीं
साहिल अहमद
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बकरी ''में-में'' करती है
बकरा ज़ोर लगाता है
साहिल अहमद
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कल तलक सहरा बसा था आँख में
अब मगर किस ने समुंदर रख दिया
साहिल अहमद
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