ज़ुल्फ़-ए-बरहम की जब से शनासा हुई
ज़िंदगी का चलन मुजरिमाना हुआ
साग़र सिद्दीक़ी
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ज़ुल्फ़-ए-बरहम की जब से शनासा हुई
ज़िंदगी का चलन मुजरिमाना हुआ
साग़र सिद्दीक़ी
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बस इस ख़याल से देखा तमाम लोगों को
जो आज ऐसे हैं कैसे वो कल रहे होंगे
सग़ीर मलाल
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एक लम्हे में ज़माना हुआ तख़्लीक़ 'मलाल'
वही लम्हा है यहाँ और ज़माना है वही
सग़ीर मलाल
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एक लम्हे में ज़माना हुआ तख़्लीक़ 'मलाल'
वही लम्हा है यहाँ और ज़माना है वही
सग़ीर मलाल
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एक रहने से यहाँ वो मावरा कैसे हुआ
सब से पहला आदमी ख़ुद से जुदा कैसे हुआ
सग़ीर मलाल
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घर के बारे में यही जान सका हूँ अब तक
जब भी लौटो कोई दरवाज़ा खुला होता है
सग़ीर मलाल
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