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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

उन से बचना कि बिछाते हैं पनाहें पहले
फिर यही लोग कहीं का नहीं रहने देते

सग़ीर मलाल




उन से बचना कि बिछाते हैं पनाहें पहले
फिर यही लोग कहीं का नहीं रहने देते

सग़ीर मलाल




ज़माने भर से उलझते हैं जिस की जानिब से
अकेले-पन में उसे हम भी क्या नहीं कहते

सग़ीर मलाल




ज़रूरत उस की हमें है मगर ये ध्यान रहे
कहाँ वो ग़ैर-ज़रूरी कहाँ ज़रूरी है

सग़ीर मलाल




ज़रूरत उस की हमें है मगर ये ध्यान रहे
कहाँ वो ग़ैर-ज़रूरी कहाँ ज़रूरी है

सग़ीर मलाल




बुझ रहे हैं चराग़-ए-दैर-ओ-हरम
दिल जलाओ कि रौशनी कम है

सहाब क़ज़लबाश




अजीब होते हैं आदाब-ए-रुख़स्त-ए-महफ़िल
कि वो भी उठ के गया जिस का घर न था कोई

सहर अंसारी