कल जिन्हें छू नहीं सकती थी फ़रिश्तों की नज़र
आज वो रौनक़-ए-बाज़ार नज़र आते हैं
साग़र सिद्दीक़ी
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कल जिन्हें छू नहीं सकती थी फ़रिश्तों की नज़र
आज वो रौनक़-ए-बाज़ार नज़र आते हैं
साग़र सिद्दीक़ी
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ख़ाक उड़ती है तेरी गलियों में
ज़िंदगी का वक़ार देखा है
साग़र सिद्दीक़ी
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लोग कहते हैं रात बीत चुकी
मुझ को समझाओ! मैं शराबी हूँ
साग़र सिद्दीक़ी
लोग कहते हैं रात बीत चुकी
मुझ को समझाओ! मैं शराबी हूँ
साग़र सिद्दीक़ी
मैं आदमी हूँ कोई फ़रिश्ता नहीं हुज़ूर
मैं आज अपनी ज़ात से घबरा के पी गया
साग़र सिद्दीक़ी
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मैं ने जिन के लिए राहों में बिछाया था लहू
हम से कहते हैं वही अहद-ए-वफ़ा याद नहीं
साग़र सिद्दीक़ी
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