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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

तुम से मिलती-जुलती मैं आवाज़ कहाँ से लाऊँगा
ताज-महल बन जाए अगर मुम्ताज़ कहाँ से लाऊँगा

साग़र आज़मी




तुम से मिलती-जुलती मैं आवाज़ कहाँ से लाऊँगा
ताज-महल बन जाए अगर मुम्ताज़ कहाँ से लाऊँगा

साग़र आज़मी




उस के जज़्बात से यूँ खेल रहा हूँ 'साग़र'
जैसे पानी में कोई आग लगाना चाहे

साग़र आज़मी




ये जो दीवार पे कुछ नक़्श हैं धुँदले धुँदले
उस ने लिख लिख के मेरा नाम मिटाया होगा

साग़र आज़मी




आँख तुम्हारी मस्त भी है और मस्ती का पैमाना भी
एक छलकते साग़र में मय भी है मय-ख़ाना भी

साग़र निज़ामी




आओ इक सज्दा करूँ आलम-ए-बद-सम्ती में
लोग कहते हैं कि 'साग़र' को ख़ुदा याद नहीं

साग़र निज़ामी




आओ इक सज्दा करूँ आलम-ए-बद-सम्ती में
लोग कहते हैं कि 'साग़र' को ख़ुदा याद नहीं

साग़र निज़ामी