तख़्लीक़ अँधेरों से किए हम ने उजाले
हर शब को इक ऐवान-ए-सहर हम ने बनाया
साग़र निज़ामी
तेरे नग़्मों से है रग रग में तरन्नुम पैदा
इशरत-ए-रूह है ज़ालिम तिरी आवाज़ नहीं
साग़र निज़ामी
वो मिरी ख़ाक-नशीनी के मज़े क्या जाने
जो मिरी तरह तिरी राह में बर्बाद नहीं
साग़र निज़ामी
वो मिरी ख़ाक-नशीनी के मज़े क्या जाने
जो मिरी तरह तिरी राह में बर्बाद नहीं
साग़र निज़ामी
वो सवाल-ए-लुत्फ़ पर पत्थर न बरसाएँ तो क्यूँ
उन को परवा-ए-शिकस्त-ए-कासा-ए-साइल नहीं
साग़र निज़ामी
यही सहबा यही साग़र यही पैमाना है
चश्म-ए-साक़ी है कि मय-ख़ाने का मय-ख़ाना है
साग़र निज़ामी
यही सहबा यही साग़र यही पैमाना है
चश्म-ए-साक़ी है कि मय-ख़ाने का मय-ख़ाना है
साग़र निज़ामी

