दूर तक एक ख़ला है सो ख़ला के अंदर
सिर्फ़ तन्हाई की सूरत ही नज़र आएगी
साबिर ज़फ़र
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गुज़ारता हूँ जो शब इश्क़-ए-बे-मआश के साथ
तो सुब्ह अश्क मिरे नाश्ते पे गिरते हैं
साबिर ज़फ़र
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गुज़ारता हूँ जो शब इश्क़-ए-बे-मआश के साथ
तो सुब्ह अश्क मिरे नाश्ते पे गिरते हैं
साबिर ज़फ़र
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हम इतना चाहते थे एक दूसरे को 'ज़फ़र'
मैं उस की और वो मेरी मिसाल हो के रहा
साबिर ज़फ़र
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हर दर्जे पे इश्क़ कर के देखा
हर दर्जे में बेवफ़ाइयाँ हैं
साबिर ज़फ़र
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हर शख़्स बिछड़ चुका है मुझ से
क्या जानिए किस को ढूँढता हूँ
साबिर ज़फ़र
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इक-आध बार तो जाँ वारनी ही पड़ती है
मोहब्बतें हों तो बनता नहीं बहाना कोई
साबिर ज़फ़र
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