रास्ता रोक के कह लूँगा जो कहना है मुझे
क्या मिलोगे न कभी राह में आते जाते
रिन्द लखनवी
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रिंदान-ए-इश्क़ छुट गए मज़हब की क़ैद से
घंटा रहा गले में न ज़ुन्नार रह गया
रिन्द लखनवी
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रिंदान-ए-इश्क़ छुट गए मज़हब की क़ैद से
घंटा रहा गले में न ज़ुन्नार रह गया
रिन्द लखनवी
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रुतबा-ए-कुफ़्र है किस बात में कम ईमाँ से
शौकत-ए-काबा तो है शान-ए-कलीसा देखो
रिन्द लखनवी
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शौक़-ए-नज़्ज़ारा-ए-दीदार में तेरे हमदम
जान आँखों में मिरी जान रहा करती है
रिन्द लखनवी
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शौक़-ए-नज़्ज़ारा-ए-दीदार में तेरे हमदम
जान आँखों में मिरी जान रहा करती है
रिन्द लखनवी
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तबीअ'त को होगा क़लक़ चंद रोज़
ठहरते ठहरते ठहर जाएगी
रिन्द लखनवी
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