परों को खोल दे ज़ालिम जो बंद करता है
क़फ़स को ले के मैं उड़ जाऊँगा कहाँ सय्याद
रिन्द लखनवी
फेर लाता है ख़त-ए-शौक़ मिरा हो के तबाह
ज़ब्ह कर डालूँगा अब की जो कबूतर बहका
रिन्द लखनवी
फेर लाता है ख़त-ए-शौक़ मिरा हो के तबाह
ज़ब्ह कर डालूँगा अब की जो कबूतर बहका
रिन्द लखनवी
फिर वही कुंज-ए-क़फ़स है वही सय्याद का घर
और दो रोज़ हवा बाग़ में खा ले बुलबुल
रिन्द लखनवी
फिर वही कुंज-ए-क़फ़स है वही सय्याद का घर
चार दिन और हवा बाग़ की खा ले बुलबुल
रिन्द लखनवी
क़ैस समझा मिरी लैला की सवारी आई
दूर से जब कोई सहरा में बगूला उट्ठा
रिन्द लखनवी
क़ैस समझा मिरी लैला की सवारी आई
दूर से जब कोई सहरा में बगूला उट्ठा
रिन्द लखनवी

