बहुत दिनों में ये उक़्दा खुला कि मैं भी हूँ
फ़ना की राह में इक नक़्श-ए-जावेदाँ की तरह
रसा चुग़ताई
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बहुत दिनों में ये उक़्दा खुला कि मैं भी हूँ
फ़ना की राह में इक नक़्श-ए-जावेदाँ की तरह
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बहुत दिनों से कोई हादसा नहीं गुज़रा
कहीं ज़माने को हम याद फिर न आ जाएँ
रसा चुग़ताई
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चाँद होता नहीं हर इक चेहरा
फूल होते नहीं सुख़न सारे
रसा चुग़ताई
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चाँद होता नहीं हर इक चेहरा
फूल होते नहीं सुख़न सारे
रसा चुग़ताई
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दिल धड़कता है सर-ए-राह-ए-ख़याल
अब ये आवाज़ जहाँ तक पहुँचे
रसा चुग़ताई
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घर में जी लगता नहीं और शहर के
रास्ते लगते नहीं अपने अज़ीज़
रसा चुग़ताई
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