सख़्त-जाँ वो हूँ कि मक़्तल से सर-अफ़राज़ आया
कितनी तलवारों को देता हुआ आवाज़ आया
परवेज़ शाहिदी
याद हैं आप के तोड़े हुए पैमाँ हम को
कीजिए और न शर्मिंदा-ए-एहसाँ हम को
परवेज़ शाहिदी
ये ताज के साए में ज़र-ओ-सीम के ख़िर्मन
क्यूँ आतिश-ए-कश्कोल-ए-गदा से नहीं डरते
परवेज़ शाहिदी
लगा जब यूँ कि उकताने लगा है दिल उजालों से
उसे महफ़िल से उस की अलविदा'अ कह कर निकल आए
परविंदर शोख़
जिन के होंटों पे हँसी पाँव में छाले होंगे
हाँ वही लोग तुम्हें चाहने वाले होंगे
परवाज़ जालंधरी
कलेजा रह गया उस वक़्त फट कर
कहा जब अलविदा उस ने पलट कर
पवन कुमार
अजीब शय है तसव्वुर की कार-फ़रमाई
हज़ार महफ़िल-ए-रंगीं शरीक-ए-तन्हाई
पयाम फ़तेहपुरी

