'साहिर' ये मेरा दीदा-ए-गिर्यां है और मैं
सहरा में कोई दूसरा झरना तो है नहीं
परवेज़ साहिर
वक़्त अच्छा ज़रूर आता है
पर कभी वक़्त पर नहीं आता
परवेज़ साहिर
अभी से सुब्ह-ए-गुलशन रक़्स-फ़रमा है निगाहों में
अभी पूरी नक़ाब उल्टी नहीं है शाम-ए-सहरा ने
परवेज़ शाहिदी
गीत हरियाली के गाएँगे सिसकते हुए खेत
मेहनत अब ग़ारत-ए-जागीर तक आ पहुँची है
परवेज़ शाहिदी
गुज़रा है कौन फूल खिलाता ख़िराम से
'शादाब' आज राहगुज़र पा रहा हूँ मैं
परवेज़ शाहिदी
मिरी ज़िंदगी की ज़ीनत हुई आफ़त-ओ-बला से
मैं वो ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म हूँ जो सँवर गई हवा से
परवेज़ शाहिदी
न जाने कह गए क्या आप मुस्कुराने में
है दिल को नाज़ कि जान आ गई फ़साने में
परवेज़ शाहिदी

