निकले हैं घर से देखने को लोग माह-ए-ईद
और देखते हैं अबरू-ए-ख़मदार की तरफ़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
पौ फटते ही 'रियाज़' जहाँ ख़ुल्द बन गया
ग़िल्मान-ए-महर साथ लिए आई हूर-ए-सुब्ह
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
पी बादा-ए-अहमर तो ये कहने लगा गुल-रू
मैं सुर्ख़ हूँ तुम सुर्ख़ ज़मीं सुर्ख़ ज़माँ सुर्ख़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
सुनते सुनते वाइ'ज़ों से हज्व-ए-मय
ज़ोफ़ सा कुछ आ गया ईमान में
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ठहर जाओ बोसे लेने दो न तोड़ो सिलसिला
एक को क्या वास्ता है दूसरे के काम से
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
उसी दिन से मुझे दोनों की बर्बादी का ख़तरा था
मुकम्मल हो चुके थे जिस घड़ी अर्ज़-ओ-समा बन कर
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
वाइ'ज़ को लअ'न-तअ'न की फ़ुर्सत है किस तरह
पूरी अभी ख़ुदा की तरफ़ लौ लगी नहीं
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

