ज़ीस्त ने मुर्दा बना रक्खा था मुझ को हिज्र में
मौत ने दिखला दिया आ कर मसीहाई का रंग
पीर शेर मोहम्मद आजिज़
दीदनी है तिरे इ'ताब का रंग
शीशा-ए-चश्म में शराब का रंग
पिन्हाँ सिपहर आरा ख़ातून
इक सज़ा और असीरों को सुना दी जाए
यानी अब जुर्म-ए-असीरी की सज़ा दी जाए
पीरज़ादा क़ासीम
शहर तलब करे अगर तुम से इलाज-ए-तीरगी
साहिब-ए-इख़्तियार हो आग लगा दिया करो
पीरज़ादा क़ासीम
तुम्हें जफ़ा से न यूँ बाज़ आना चाहिए था
अभी कुछ और मिरा दिल दुखाना चाहिए था
पीरज़ादा क़ासीम
उस की ख़्वाहिश है कि अब लोग न रोएँ न हँसें
बे-हिसी वक़्त की आवाज़ बना दी जाए
पीरज़ादा क़ासीम
मंगल को बजरंग-बली से तेरा शुक्र मनाऊँ
और शुक्र को तू अल्लाह से मेरा मंगल माँगे
प्रबुद्ध सौरभ

