मैं फूल चुनती रही और मुझे ख़बर न हुई
वो शख़्स आ के मिरे शहर से चला भी गया
परवीन शाकिर
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मैं सच कहूँगी मगर फिर भी हार जाऊँगी
वो झूट बोलेगा और ला-जवाब कर देगा
परवीन शाकिर
मैं उस की दस्तरस में हूँ मगर वो
मुझे मेरी रज़ा से माँगता है
परवीन शाकिर
मक़्तल-ए-वक़्त में ख़ामोश गवाही की तरह
दिल भी काम आया है गुमनाम सिपाही की तरह
परवीन शाकिर
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मसअला जब भी चराग़ों का उठा
फ़ैसला सिर्फ़ हवा करती है
परवीन शाकिर
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मेरे चेहरे पे ग़ज़ल लिखती गईं
शेर कहती हुई आँखें उस की
परवीन शाकिर
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मेरी चादर तो छिनी थी शाम की तन्हाई में
बे-रिदाई को मिरी फिर दे गया तश्हीर कौन
परवीन शाकिर
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